Subhadra Kumari Chauhan

Subhadra Kumari Chauhan biography in hindi

Subhadra Kumari Chauhan biography in hindi

सुभद्रा कुमारी चौहान का जीवन परिचय-

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Subhadra Kumari Chauhan प्रारंभिक जीवन –

Subhadra Kumari Chauhan सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त 1904 ईस्वी को इलाहाबाद के निहालपुर में हुआ में हुआ था इनके पिता का नाम राम नाथ सिंह था यह बहुत बड़े ज़मींदार थे। सुभद्रा कुमारी चौहान चार भाई बहन थे। इनका विवाह 15 वर्ष के उम्र में ही खंडवा के ठाकुर लक्ष्मण सिंह के साथ करा दिया गया। उनके पति भी एक साहित्यकार थे। अच्छे परिवार में जन्म लेने के कारन उनका पालन पोसन शिक्षा दीक्षा बहुत अच्छे से हुआ।

सुभद्रा कुमारी चौहान शिक्षा ( Subhadra Kumari Chauhan Education) –

Subhadra Kumari Chauhan सुभद्रा जी का प्रारंभिक शिक्षा उनके पिता के देख रेख में इलाहाबाद में ही हुआ कक्षा नौ तक की पढाई क्रास्थवेट कॉलेज में हुआ लेकिन कुछ कारण वश उनकी पढाई बीच में ही छोड़नी पड़ी सुभद्रा जी बचपन से ही चंचल थी उन्हें अपने विद्यालय में प्रथम आने पर प्रुस्कार मिलता था वह बहुत ही कम समय में कविता की रचना कर लेती थी। कविता के रचना के कारन उनके विद्यालय में बहुत प्रसिद्धि थी। बहादुर और विद्रोही स्वभाव तो उनका बचपन से ही था उनका वक्तित्व संघर्ष प्रेम सहस त्याग से युक्त रहा है। वह बहुत अच्छी माँ थी उन्हें पांच संतान थे। सुभारदा जी एक आदर्श पत्नी और उत्तम गृहणी थी। उनके सम्पूर्ण जीवन को एक आदर्श जीवन कहा जाता है।

उनके पति ठाकुर लक्ष्मण सिंह एक प्रसिद्ध नाटक कार और एक सच्चे देश भक्त थे वह आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिए और सुभद्रा जी भी विवाह के डेढ़ साल वाद उस आजादी आंदोलन में हिस्सा ले लिया। सुभद्रा जी महात्मा गाँधी जी से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने इस आंदोलन के लिए अपने सारे गहने बेच दिए और विदेशी वस्त्रो का त्याग कर दिया।

सन 1921 में महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाली देश की प्रथम महिला थी उस समय सुभद्रा जी का उम्र महज 17 साल था। इतना ही नहीं जबलपुर के टाउन हॉल में झंडा सत्याग्रह के कारन ग्रिफ्तार होकर जेल जाने वाली देश की प्रथम महिला थी। उन्होंने अपने रचनाओं से भी लोगो के दिल में देश प्रेम की भावनाओ को जगाती थी अनेको बार जेल की यात्रा करने तथा सभी कष्टों को झेलते हुए उन्होंने देश भक्ति गृहस्थ जीवन के साथ साथ साहित्य जीवन और देश के लिए समर्पित जीवन जीती रही।

साहित्य जीवन –

Subhadra Kumari Chauhan जी हिन्दी साहित्य की एक मात्र ऐसी कवियित्री थी जिन्होंने ने देश प्रेम की भावना जगाने वाली कविताये लिखी इनकी कभी में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में खुद झोंक देने वाली प्रेरित कविताएं है। इन्होने मात्र 9 वर्ष की उम्र में ही कवितायेँ लिखना शुरू कर दी थी इनकी पहली कविता इलाहाबाद में निकलने वाली पत्रिका मर्यादा में नीम शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इनका यह कविता सुभद्रा कुमारी के नाम से प्रकाशित हुआ।

सुभद्रा जी को कविता लिखने का बहुत सौक था लेकिन इसके साथ साथ उन्होंने कहानिया भी लिखती थी। इनका पहला काव्य संग्रह मुकुल 1930 में प्रकाशित हुआ। और इनकी चुनी हुयी कविता इनके काव्य संग्रह त्रिधारा में प्रकाशित हुआ सुभद्रा जी के द्वारा रचित कविता ,झाँसी की रानी , हिंदी साहित्य में लोगो द्वारा सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली लोकप्रिय कविता है।

सुभद्रा कुमारी चौहान का प्रमुख रचना

Major composition of Subhadra Kumari Chauhan –

इन्होने दो कविता संग्रह तथा तीन कथा संग्रहों को रचना की है

-इनके कविता संग्रह -मुकुल ,और त्रिधारा है।

और कहानी संग्रह है ,-बिखरे मोती ,उन्मादनी ,सीधे साधे चित्र ,

मृत्यु –

अपने साहित्य के द्वारा देश प्रेम की भावना को जगाने वाली महान कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान का 15 फ़रवरी 1948 को सड़क दुर्घटना के कारन मृत्यु हो गया।

पुरस्कार –

Subhadra Kumari Chauhan सुभद्रा जी की रचना मुकुल तथा बिखरे मोती के लिए अलग अलग सेकसरिया पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारतीय डाक ने 6 अगस्त 1976 को सुभद्रा जी के सम्मान में 25 पैसे का एक डाक टिकट जारी किया।

भारतीय नौसेना ने 28 अप्रैल 2006 को सुभद्रा जी को सम्मानित करते हुए नवीन नियुक्त नौसेना ज़हाज़ को सुभद्रा जी का नाम दिया।

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सुभद्रा कुमारी चौहान की सबसे लोकप्रिय कवितायेँ –

Most Popular Poems of Subhadra Kumari Chauhan

झाँसी की रानी…..

सिहासन हिल उठे राजवंशो ने भुकुटि तानी थी ,
बूढ़े भारत में भी आयी फिर से नयी जवानी थी ,
गुमी हुयी आजादी की कीमत सबने पहचानी थी
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की , मुँहबोली बहन छबीली थी ,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी ,
नाना के संग पढ़ती थी वह नाना के संग खेली थी
बरछी ढल कृपाल कटारी उसकी यही सहेली थी।

बीर शिवाजी की गाथाये उसको याद जबानी थीं ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वं वीरता की अवतार ,
देख मराठे पुलकित होते उसकी उसकी तलवारों के वॉर ,
नकली युद्ध -व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार ,
सैन्य घेरना दुर्ग तोडना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।

महाराष्ट्र की कुल देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुयी बीरता के वैभव के साथ सगाई झाँसी में ,
ब्याह हुआ रानी बन आयी लक्ष्मीबायीं झाँसी में ,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छायी झाँसी में ,
सुघट बुंदेलों के बिरुदावली -सी वह आयी थी झाँसी में।

चित्रा ने अर्जुन को पाया शिव को मिली भवानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य मुदित महलो में उजयाली छायी ,
किन्तु कालगति चुपके -चुपके काली घटा घेर लाई ,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियां कब भाई
रानी बिधवा हुयी ,हाय !विधि को भी नहीं दया आयी।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक – समानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया ,
फ़ौरन फ़ौज भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया ,
लावारिस का वारिस बन कर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुयी बिरानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती हैं विकत शासको की माया ,
बन दया चाहता था जब यह भारत आया ,
डलहौजी ने पैर पसारे ,अब तो पलट गयी काया ,
राजाओ नब्बाबो को भी उसने पैरो ठुकराया।

रानी दासी बनी बनी यह दासी अब महरानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की लखनऊ छिना बातो-बात ,
कैद पेशवा था बिठूर में हुआ नागपुर का भी घात ,
उदयपुर तंजौर सतारा कर्नाटक की कौन बिसात ?
जब की सिंध पंजाब ब्रह्मा पर अभी हुआ था ब्रज निपात।

बंगले मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयी रनिवासों मे बेगम गम से थी बेजार ,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार ,
सरे आम नीलम छापते थे अंग्रेजो के अख़बार ,
नागपुर के जेवर लो लखनऊ के ले लो नौलख हार।

यों परदे की इज्जत परदेशी की साथ बिकानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियो में भी बिषम वेदना महलो में आहत अपमान ,
बीर सैनिको के मन में था अपने पुर्खो का अपमान ,
नाना घुंघुपंत पेशवा जुटा रहा था सब समान ,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्होंने तो सोई ज्योति जगानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलो ने दी आग झोपड़ी ने ज्वाला सुलगायी थी ,
यह स्वतंत्रता की चिंगारी अंतरतम से आयी थी ,
झाँसी चेती दिल्ली चेती लखनऊ लपटे छायी थी ,
मेरठ कानपूर पटना ने काफी धूम मचाई थी।

जबलपुर कोल्हा पुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

यह स्वतंत्रता महा यज्ञ में कई बीरवर आये काम ,
नाना धुंधुपंत तांतियां चतुर अजीमुल्ला सरनाम ,
अहमद शाह मौलवी ठाकुर कुवंर सिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिसके नाम।

लेकिंन आज जो जुर्म कहलाती उसकी जो कुर्वानी थी ;
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़ चलें हम झाँसी के मैदानों में ,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबायीं मर्द बनी मर्दानों में ,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुंचा आगे बढ़ा जवानो में ,
रानी ने तलवार खींच ली द्वंद आसमानो में।

जख्मी होकर वकार भागा उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आयी कर सौ मिल निरंतर पार ,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार ,
यमुना तट पर अंग्रजो ने फिर खायी रानी से हार ,
विजयी रानी आगे चल दी किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेजो के मित्र सिंघिया ने छोड़ी राजधानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजयी मिली फिर अंग्रेजो की सेना फिर घिर आयी थी ,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था उसने खायी थी ,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आयी थी ,
युद्ध छेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज आ गया ! हाय गिरी अब रानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट के चलती बनी सैन्य के पार ,
किन्तु सामने नाला आया था वह संकट बिषम आपार ,
घोड़ा अड़ा न्य घोड़ा थी इतने में आ गए सवार ,
रानी एक ,शत्रु बहुतेरे होने लगे वार – पर – वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे बीर गति पानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गयी सिधार चिंता अब उसकी दिव्य सवारी थी ,
मिला तेज से तेज तेज की वह सच्ची अधिकारी थी ,
अभी उम्र कुल तेईस की थी मनुज नहीं अवतारी थी ,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता नारी थी।

दिखा गयी पथ सीखा गयी हमको जो सिख सिखानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी ,
यह तेरा बलिदान जागबेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास लगे सचाई को चाहे फांसी ,
हो मदमाती बिजय मिटादे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा अस्मारक तू ही होगी तू खुद अमिट निशानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

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