पृथ्वीराज़ चौहान और संयोगिता की अमर प्रेम कहानी

पृथ्वीराज़ चौहान और संयोगिता की अमर प्रेम कहानी

 पृथ्वीराज़ चौहान और संयोगिता की अमर प्रेम कहानी

इतिहास में कुछ ऐसे प्रेमी प्रेमिकाए की कहानिया है जो कभी भुलाई नहीं जा सकती जिसे आज भी याद किया जाता है और आने वाले कई पीढ़ियों में उन्हें याद किया जायेगा। आज कल के प्रेमी इन्ही प्रेमियों की कस्मे खाते है। इन प्रेमियों के वजह से कई बड़ी बड़ी रियासते हिल गयी दोस्त दुसमन बन गए दुसमन दोस्त बन गए। उन प्रेमियों में जूनून था अपने प्यार को पाने की वो कसमे कहते थे। और उसे पूरा करने  के लिए अपनी क़ुरबानी तक दे देते थे। उन्ही महान  योद्धाओ की प्रेम कहानी जो दुनिया में अपने प्रेम और बीरता के लिए जाने गए। 

                                                                                                        ये वही महान योद्धा थे  जिनका नाम पृथ्वीराज़ चौहान है पृथ्वीराज़ चौहान के बारे में कोन  नहीं कौन नहीं जनता ये एक ऐसा बीर योद्धा जिन्होने बचपन में ही शेर का जबरा  फार डाला था। जिन्होने अपने दोनों आँख खोने के बाद भी भरी सभा में अपने दुसमन मोहम्द गौरी को शब्दवेदी वान से मौत के घाट उत्तार दिया था। लोग तो जानते हैं की वो एक महान बीर योद्धा थे लेकिन ये कम लोग जानते  हैं की वे एक प्रेमी भी थे। वो कन्नौज के महराज जयचंद की पुत्री संयोगिता से बहुत प्रेम करते थे। और स्वंबर के बिच से अपनी प्रेमिका को अपहरण कर के ले आये थे। ये कहानी उन दिनों की है जब  पृथ्वीराज़  चौहान अपने नाना और दिल्ली के सम्राट महाराजा आनंद पाल दिल्ली के राजगद्दी पर बैठे थे। गौरब की बात है की महाराजा आनंद पाल को कोई पुत्र नहीं था। इसलिए उन्होंने अपने दामाद अजमेर के महाराज पृथ्वीराज़ चौहान के पिता सोमेस्वर सिंह चौहान से आग्रह किया की वे पृथ्वीराज़ चौहान को दिल्ली का युवराज घोसित करने का कृपा प्रदान करे। 

                     महाराजा सोमेस्वर सिंह ने अपनी सहमति जता दी और अपने पुत्र पृथ्वी राज़ चौहान को दिल्ली का युवराज घोसित कर दिया काफी राजनैतिक संघर्ष के वाद पृथ्वीराज़ चौहान दिल्ली के सम्राट बने। राजगद्दी सँभालने के साथ इन्हे जयचंद की पुत्री संयोगिता से प्रेम  हो गया उस समय कन्नौज में महाराज जयचंद का राज़ थी उनकी एक बहुत ही खूबसूरत राजकुमारी थी जिसका नाम संयोगिता थी। जयचंद पृथ्वीराज़ चौहान के बढ़ते बीरता और यश के कारन हमेसा जलते थे और ईर्ष्या का भाव रखते थे। एक दिन कन्नौज में महान चित्रकार पन्ना राय आया जिसके पास दुनिया के कई बीर महारथियों के चित्र थे। और उन्ही में से एक चित्र था दिल्ली के  महान युवा सम्राट पृथ्वीराज़ चौहान का। जब कन्नौज के सुंदरियों ने पृथ्वी राज़ चौहान की चित्र देखि तो देखती ही रह गयी। सभी सुंदरियाँ उनके सुंदरता का बखान करते नहीं थक रही थी। उनकी तारीफ की ये बाते राजकुमारी संयोगिता की कानो तक जा पहुंची तब  राजकुमारी संयोगिता पृथ्वी राज़ चौहान की चित्र देखने के लिए लालायित हो गयी  जब संयोगिता अपने सहेली के साथ उन चित्रकार के पास पंहुचा और सम्राट पृथ्वी राज़ चौहान के चित्र दिखाने के लिए बोली। चित्र देखते ही संयोगिता को पहले नजर में पृथ्वी राज़ चौहान से प्रेम हो गया और वो अपना सर्वस्व पृथ्वी राज़ चौहान को दे बैठी। 

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                                     महाराज जयचंद और पृथ्वी राज़ चौहान में कट्टर दुश्मनी होने के कारण उन  दोनों  मिलन असंभव था। तब वो चित्रकार दिल्ली पंहुचा और राजकुमारी संयोगिता का चित्र बनाकर महाराज पृथ्वीराज  चौहान को दिखाया। चित्र देखते ही पृथ्वीराज चौहान के भी संयोगिता के लिए प्रेम उमर पड़ा। कुछ ही दिनों बाद जब महाराज जयचंद ने कन्नोज में अपने पुत्री राजकुमारी संयोगिता के लिए स्वंबर रखा। 

                                                                                                 जिसमे बिभिन्नं राज़ के राजकुमारो  और राजाओ को आमंत्रित किया गया। लेकिन अपनी दुश्मनी के कारण जयचंद ने पृथ्वीराज़ चौहान को निचा दिखाने के लिए उसे इस स्वंबर में आमंत्रित नहीं किया। और उनकी अपमान करने के लिए जयचंद ने पृथ्वीराज़ चौहान की मूर्ति को द्वार पाल के रूप में खरा कर दिया। जब राजकुमारी संयोगिता बरमाला लिए स्वंबर में आयी तो उन्हें अपने पसंद का वर पृथ्वीराज़ चौहान कहि नजर नहीं आये। इसी समय जब उनकी नजर द्वारपाल की जगह पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति पर नजर पड़ी और उन्होंने आगे बढ़कर बरमाला पृथ्वीराज़ चौहान की मूर्ति के  गले में डाल दी। ये बास्तविक घटना है की जिस समय उसने पृथ्वीराज चौहान के मूर्ति के गले में वरमाला डाली उसी समय पृथ्वीराज चौहान वहां आकर खड़े हो गए। उनके गले में बरमाला डालते ही महाराज जयचंद आगबबूले हो गए और तलवार लेकर जैसे ही जयचंद संयोगिता को मारने गए तब तक पृथ्वीराज चौहान संयोगिता को वहाँ से लेकर निकल पड़े थे। स्वंबर से संयोगिता को उठाने के बाद पृथ्वीराज चौहान दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे अपने इस  अपमान  बदला लेने के लिए जयचंद ने मुहमद गौरी से मित्रता कर ली और दिल्ली पर आक्रमण कर दिया  पृथ्वी राज़ चौहान ने मोहमद गौरी को 16 बार पराजित किया था। और हर बार पृथ्वीराज चौहान ने उसे माफ़ कर दिया था। हर बार मोहमद गौरी को जीवित छोर दिया। राजा जयचंद ने गद्दारी करते हुए मोहमद गौरी को अपनी सेना से मदद किया इससे मोहमद गौरी का सैन्य ताकत दुगुना हो गया और इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पराजय हो गया और मोहमद गौरी के द्वारा बंदी बनाकर उसे अपने देश लेजाकर  गर्म सलाखे से पृथ्वीराज चौहान की आँखे जला दिया गया। इसके साथ उन्हें अलग  अलग तरह की दर्द दिया गया। लेकिन फिर भी पृथ्वी राज़ चौहान ने अपने दिल से हार नहीं  माना था और फिर भी उसने मोहमद गौरी को मारने का फैसला किया और पृथ्वीराज चौहान के एक खाश मित्र जिसका नाम था चन्दन बरदायी जिन्होने अपने दोस्त को  बचाने के लिए उसने मुहमद गौरी के राज़ पंहुचा उसे पहुंचते ही उसको  बंदी बना लिया गया और एक ही कोठरी  को बंद कर दिया गया चन्दन बरदायी ने एक दिन योजना बनाई की मोहमद गौरी को शब्दभेदी वाण  के द्वारा मारने का फैशला किया। और ये बात मोहमद गौरी तक पहुंचाया की पृथ्वीराज चौहान को शब्दभेदी वाण छोड़ने में महारथ  हांसिल है ये रोमांचित बात सुनकर मोहमद गौरी ने इस कला के प्रदर्सन का आदेश दिया। कला प्रदर्शन के दौरान गौरी के मुख से शाबाश आरम्भ करो  आवाज़ निकलते ही चन्दन बरदायी ने एक पृथ्वी राज़ चौहान को एक दोहे में गौरी  बैठने का स्थान का संकेत दिया। जो दोहा इस प्रकार है –

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण 

ता ऊपर सुल्तान है, मत चुके चौहान “

तभी अचूक शब्दभेदी वाण  पृथ्वी राज़ चौहान ने मोहमद गौरी को मौत का घाट उत्तार दिया और दर्दनाक मौत से बचने  लिए चन्दन बरदायी और पृथ्वीराज  चौहान ने एक दूसरे का बध्य कर दिया इस बात की खबर सुनते ही सैंयोगिता एक बीरांगना की तरह सती हो गयी इतिहास में ऐसे कई महान बीर योद्धाओ की प्रेम कहानी आज भी अमर है जैसे बाजीराव और मस्तानी  की प्रेम कहानी पद्मबती और महराज रतन सिंह की प्रेम कहानी सुने जाते है |

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